समाज को चाहिए पुलिस के पास हो आत्माओं जैसी तेज गति!

समाज को चाहिये पुलिस के पास हो आत्माओं जैसी तेज गति !

पंकज सिंह संवादाता

अपराध की रोकथाम के लिए सरकार ने कानून बनाये और समाज की अच्छी बुरी जानकारी को तत्काल से देश प्रदेश के लोगों तक पहुंचाने का कार्य मिला बुद्धजीवी दूरदर्शी कहे जाने वाले पत्रकारों को जो काफी हद तक सफल भी रहतें रहें पर वही एक तबका ऐसा भी है तो पुलिस की अच्छी छवि को नजरअंदाज कर कीचड़ उछालने के गंदे कार्यों में लगातार प्रयासरत हैं इन की कलम जैसे ही कोई घटना कांड की जानकारी दे तो पुलिस को मात्र कुछ मिनट में पहुंचने का आदेश पारित करती है इनके मुताबिक यदि मात्र कुछ समय मे नही पहुंच पाती तो फिर से कलम को लाठी बनाकर पीटते हैं जब तक कलम की स्याही खत्म नही हो जाती

घटना होने के बाद पुलिस को देर इस तरह भी हो सकती है

अमूमन घटना होते ही खबर प्रसारित होने के बाद ही पुलिस को पता चलता है तो यदि मोटर साईकिल से हैं तो हो सकता है भीड़भाड़ वजह बन रही हो,यह भी हो सकता है कि ड्यूटी करने वाला किसी अधिकारी से फोन पर वार्तालाप कर रहा हो अधिकारी के डर के मारे फोन नही काट सकता हो,यह भी हो सकता है कि ड्यूटी करने वाले के घर परिवार में कोई विपदा या बहुत जरूरी काम से थोड़े समय को बिजी हो गया हो,हो सकता है थाने चौकी पर से निकलने की तैयारी कर रहा हो उस समय किसी मामले को लेकर चौकी थानों पर भीड़ लगी हो ऐसे में क्या चौकी या थानों को भीड़ के हवाले कर दिया जाये

जनसँख्या के हिसाब से पुलिस की कमी खलती है

पुलिस का दर्द यह भी समझना होगा कि कांड होने के बाद पुलिस रोड पर रहती भी है तो मामूली सा एक्सीडेंट पर भी पहुंचना है,अचानक से कोई पत्रकार अधिकारी आ पहुँचता है तो उधर भी देखना होता है वायरलेस को भी ध्यान देकर उसका जवाब भी देने को तैयार रहतें हैं ऐसे में सर्व समाज को विदित होना चाहिए कि जनसँख्या विस्फोट के आगे पुलिस बहुत कम है और यदि कोई घटना हो भी जाती है तो वीडियो बनाने व उससे पूछताछ करने के बजाय उसको तत्काल अस्पताल पहुंचाया जाना चाहिए जब वह जिंदा रहेगा तो और भी जानकारियाँ देगा पर हद है ऐसी पत्रकारिता को सभी काम पुलिस के सहारे इन कलमकारों की जिम्मेदारी नही बनती है

एक रात जागने के बाद कलम लिखने को कापेंगी अहसाह करो

पुलिस हमारी सेवा को बनी है तो उनके भी कुछ इसी तरह के दर्द हैं आपको ज्ञान होना चाहिए कि कभी कभी पुलिस की ड्यूटी दिन रात लग जाती है ऐसे में इनको भी हक़ है आराम करने का पर सेवा भाव के कारण मन मारकर पुलिस दिन रात जागकर समाज की देख रेख में लगी होती है समय पर हर जगह पहुँचना भी है फौरन इलाज भी दिलवाना है भीड़ को नियंत्रित करना भी इनकी जिमनेदारी है एक दो दिन जागने की वजह से भी दिमाग काम नही करता है फिर भी ऐसे कलमकारों का कोप भजन बनना ही पड़ता है
ऐसे में यदि पत्रकारों को सिर्फ एक रात जागने के बाद किसी घटना को कवर करने को कह दिया जाए तो पत्रकार फोन तो उठा लेगा पर अपने मित्र या जूनियर को ही घटना की पूरी जानकारी लेने को भेजता है भले ही जूनियर से गलत जानकारी मिली हो अगले दिन वही खबर को छपने के बाद किरकिरी होने पर खंडन भी लिखने को मजबूर होता है
इलेक्ट्रॉनिक के इस दौर में काहिल तो पुलिस को कहा जा सकता है पत्रकार भी अब सिर्फ चंद सेकेंडों में खबर को पाकर उसको भुनाने में जुटा रहता है सच्चाई यह है कि खुद की नजरों से घटना पर जो छिपा होता है नजर आता है वैसे ही पुलिस समय पर न पहुंचकर जब पहुंचती है तो अपनी तैयारी के साथ तभी आज के समय मे लखनऊ पुलिस धड़ाधड़ खुलासे कर रही है एक खबर पुलिस के नाम लिखने पर अब लेखक भी कोप भजन का शिकार हो सकता है पर कोई बात नही सच कड़वा होता है

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