सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन। वर्तमान सरकार संसद में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन का जो प्रस्ताव लेकर आई है उससे उसकी मंशा पर प्रश्न स्वाभाविक है। प्रशासन में पारदर्शिता को लेकर जब यह कानून बना था तो इस पर खूब चर्चा हुई थी। लगभग तीन दशकों की जद्दोजहद के बाद कहीं ये कानून पास किया गया था और एक विशेष समिति की सिफारिश से इसको कानूनी जामा पहनाया गया था। परन्तु हालिया संसद में संसोधन के लिए जो प्रस्ताव आया उससे सरकार ने अपनी मंशा व्यक्त कर दी क्योंकि प्रस्ताव देते समय बहस करने को भी नही सोचा जबकि जब कानून बना था तो खूब बहस हुई थी। सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा कई आन्दोलन किये गए थे तब जाकर सरकार इसको पास करने को तैयार हुई थी। जिस तरीके से संसद में इसे समर्थन मिला इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोई भी सरकार पारदर्शिता को लेकर सतर्क नही है। जब से सूचना का अधिकार कानून पास किया गया है तब से लेकर अब तक लगभग 80 सूचना मांगने वाले कार्यकर्ताओं को मारा जा चुका है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कानून किस प्रकार पारदर्शिता में प्रति जवाबदेह था। इससे बाहुबलियों व भ्रष्टाचारियों पर कितनी लगाम कसी जा रही थी। देश की अखंडता को छोड़कर लगभग सभी प्रश्नों के जवाब मांगे जा सकते थे। यह आम नागरिकों को उसके अधिकारों के प्रति जवाबदेह बानता है। इससे सरकारी विभागों से भी सूचनाएं मांगी जा सकती है।  पुराने कानून के तहत केंद्रीय सूचना आयोग और राज्यों में राज्य सूचना आयोग की स्थापना की गई थी। केंद्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति करती थी। और इसके वेतन व भत्ते चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों के समकक्ष होते थे। परन्तु इस संसोधन से इस कानून की धारा 13, 16 व 27 में परिवर्तन करने का प्रस्ताव लाया गया है। जिसके तहत अब सूचना आयुक्तों को नियुक्त करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा। व उसकी नियुक्त, वेतन- भत्ते व सेवा शर्ते केंद्र सरकार ही तय करेगी। अगर ऐसा हो जाता है तो स्वाभाविक है कि मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्त केंद्र की कठपुतली के रूप में ही होगी। वह केंद्र सरकार के रहमोकरम पर ही पलेगा। जिससे इस संस्था की पारदर्शिता ही समाप्त हो जाएगी। यह होना लाजमी भी था क्योंकि सरकार के कुछ विभागों की जिस तरीके से सूचनाएं सामने आई और उससे उसको अपने कर्मो पर पछताना पड़ा तो उसने इस संस्था को ही अपने हाथ में लेने का फैसला कर लिया।

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