20वां कारगिल विजय दिवस आज : देश की आन-बान-शान के लिए दे दी जान, ऐसे हैं कारगिल के वीर

ANA News

26 जुलाई, 1999 को भारतीय सेना ने कारगिल को पाकिस्तानी घुसपैठियों के कब्जे से पूरी तरह मुक्त करा लिया था। इस ‘ऑपरेशन विजय’ में कई मांओं ने अपने बेटों की कुर्बानियां दीं तो कईयों की मांग का सिंदूर मिट गया। बहनों की राखियों को कलाइयां नहीं मिली तो कई बच्चों पिता के साये से महरूम हो गए। पर, कारगिल के जांबाजों ने देशप्रेम की ऐसी इबारतें लिखीं, जो शताब्दियों तक याद रखी जाएंगी।

 

वैसे तो विजय दिवस के नायकों की एक लंबी फेहरिस्त है। इसमें शहर के कई जांबाज हैं, जो कारगिल हीरोज हैं। इसमें कारगिल हीरो कैप्टन मनोज पांडेय, लांसनायक केवलानंद द्विवेदी, राइफलमैन सुनील जंग, मेजर रितेश शर्मा, कैप्टन आदित्य मिश्र, मेजर विवेक गुप्ता प्रमुख हैं। शुक्रवार को कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ है। पेश है कारगिल के जांबाजों के अदम्य शौर्य व पराक्रम पर आधारित रिपोर्ट…।

विज्ञापन

 

‘जो चाहा, कर दिखाया, ऐसा था शौर्य व पराक्रम’

 

कैप्टन मनोज पांडेय

रेजीमेंट : 11 गोरखा राइफल्स

शहादत : 3 जुलाई, 1999

 

‘अगर अपनी बहादुरी साबित करने से पहले मेरे सामने मौत भी आ गई तो मैं उसे खत्म कर दूंगा। यह सौगंध है मेरी…।’

 

कैप्टन मनोज पांडेय को कारगिल युद्ध का मुख्य नायक कहना गलत नहीं होगा। 4 मई, 1999 को उन्हें कारगिल में भारतीय चौकियों को खाली करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह पांच नंबर प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। कैप्टन पांडेय बटालिक सेक्टर में दुश्मनों पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्हें खालूबार तक हर पोस्ट को जीतने के ऑर्डर थे। इस दौरान उन्हें भयंकर गोलीबारी का सामना करना पड़ा, पर वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने दुश्मनों के चार बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया। इसी दौरान दुश्मन की गोली का शिकार हो गए।

 

कैप्टन मनोज पांडेय लखनऊ के एकलौते सैन्य अधिकारी रहे, जिन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। वह इस लिहाज से भी खुशनसीब थे कि सेना में भर्ती होने के महज दो साल बाद ही उन्हें अपने शौर्य व पराक्रम का परिचय देने का मौका मिल गया। उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद कैप्टन मनोज पांडेय राष्ट्रीय रक्षा अकादमी गए, जहां से 1997 में गोरखा राइफल्स में कमीशंड हुए।

 

गोमतीनगर निवासी कैप्टन मनोज पांडेय के पिता गोपीचंद पांडेय बताते हैं कि बेटे की शहादत पर कैप्टन मनोज पांडेय चौराहा बनाया गया है, लेकिन यहां कार्यक्रम के दौरान जाम के हालात पैदा हो जाते हैं। हम चाहते हैं कि सरकार ऐसी व्यवस्था करे, जिससे बगैर व्यवधान कार्यक्रम कराए जा सकें। कैप्टन मनोज पांडेय के परिजनों ने बताया कि सर्विस सेलेक्शन बोर्ड का साक्षात्कार था। जब उनसे पूछा गया कि फौज क्यों जॉइन करना चाहते हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि परमवीर चक्र हासिल करना है और उन्होंने परमवीर चक्र हासिल भी किया, लेकिन मरणोपरांत।

 

सकारात्मक है सरकार का रवैया

पिता गोपीचंद पांडेय कहते हैं कि केंद्र सरकार ने जिस तेजी से पाकिस्तान को उसकी ही भाषा में जवाब दिया, वह सराहनीय है। सर्जिकल स्ट्राइक कर अपनी ताकत का लोहा मनवा दिया। आतंकियों को पनाह देने वाले पाकिस्तान की चूलें हिली हुई हैं। ऐसेे ही जज्बे की सरकारों से उम्मीद रहती है।

‘कारगिल विजय की गाथाएं लोगों को सुनाईं’

 

मेजर रितेश शर्मा

रेजीमेंट : 17 जाट रेजीमेंट

शहादत : 6 अक्तूबर 1999

 

‘देश मेरे लिए सर्वोपरि था, है और हमेशा रहेगा। देश पर कुर्बान होना सौभाग्य की बात है। मौका आने पर मैं इससे पीछे नहीं हटूंगा।’

 

मेजर रितेश शर्मा ने कारगिल विजय के बाद साथी जवानों की वीरता की कहानियां लोगों को सुनाईं। खुद अदम्य साहस का परिचय देते हुए कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ा और जीत के नायक बने। वह ला-मार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे और 9 दिसम्बर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। ड्यूटी के दौरान वह मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ अपने घर आए थे। इसी दौरान उन्हें कारगिल युद्ध की सूचना मिली। बताया गया कि जवानों की पेट्रोलिंग टुकड़ी गई थी, जिसकी कोई जानकारी नहीं मिली।

 

इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए। चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रितेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इसी क्रम में दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए। उन्हें बेस कैंप में लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए। मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया।

25 सितम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। बेटे की स्मृति में पिता की ओर से स्कॉलरशिप व मेडल दिए जाते हैं। इंदिरानगर के जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपर्स को गोल्ड मेडल, आरएलबी स्कूल में हजार रुपये की छात्रवृत्ति हर साल दी जाती है।

 

इतना तो करे सरकार

इंदिरानगर में मेजर रितेश शर्मा के नाम पर एक पार्क बनवाया गया है, पर वह देखरेख के अभाव में दुर्दशा का शिकार हो रहा है। इंदिरानगर सेक्टर 20 में रहने वाले मेजर रितेश शर्मा के पिता सत्यप्रकाश शर्मा व मां दीपा शर्मा अपने स्तर पर पार्क की देखरेख करती हैं। पार्क की बाउंड्री से लेकर लाइट तक खराब है। पर, नगर निगम प्रशासन से बार-बार शिकायत के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है, जिसे लेकर आसपास के लोगों में भी खासी नाराजगी है।

‘खून से थे लथपथ, पर बिछाते रहे सिग्नलिंग के तार’

 

कैप्टन आदित्य मिश्र

रेजीमेंट : सिग्नल कोर

शहादत : जून, 1999

 

‘मां, मैं दुश्मनों को अपनी गोलियों से छलनी कर दूंगा। एक-एक बुलेट उनके शरीर में उतार दूंगा। पर, आखिरी बुलेट अपने लिए बचाकर रखूंगा ताकि पाकिस्तानियों द्वारा पकड़ा ना जा सकूं।’

 

कैप्टन आदित्य मिश्र ऐसे कारगिल हीरो हैं, जिनका ऑपरेशन विजय में अभूतपूर्व योगदान रहा। आठ जून, 1996 को सेना के सिग्नल कोर में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में भर्ती हुए थे। सितंबर, 1999 में उन्हें लद्दाख स्काउट में तैनाती मिली। इसके बाद जब कारगिल युद्ध छिड़ा तो वह बटालिक पहुंचे, जहां 17 हजार फीट ऊंची चोटी पर भारतीय पोस्ट को दुश्मनों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने धावा बोल दिया। साथ में राइफलमैन सुनील जंग और लांसनायक केवलानंद द्विवेदी ने दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ाई की।

 

इतनी ऊंचाई पर सांस लेना भी मुश्किल था। पर, शहीदों ने कोहनी के बल चढ़ाई की। काफी मशक्कत के बाद उन्होंने दुश्मनों का खात्मा कर चोटी पर फतह हासिल कर ली। चूंकि, पोस्ट पर कम्युनिकेशन के लिए तार बिछाने बहुत जरूरी थे, इसलिए वह पोस्ट से नीचे उतर आए। पर, जब वह दोबारा पोस्ट पर गए तो वहां दुश्मन काबिज हो चुके थे। दुश्मनों की गोलीबारी में वह घायल हो गए। पर, उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए पोस्ट को दुश्मनों से खाली करवाया और वहां सिग्नलिंग के तार बिछाने के बाद वीरगति को प्राप्त हुए।

 

जज्बे को बुलंदियों तक पहुंचाया

कैप्टन आदित्य मिश्र के पिता जीएस मिश्र सीनियर आर्मी ऑफिसर रहे हैं, जिन्होंने आदित्य के देशप्रेम के जज्बे को बुलंदियों तक पहुंचाया। आदित्य की पढ़ाई कैथेड्रल व चिल्ड्रेन अकादमी से हुई और पढ़ाई के दौरान से ही उसमें सेना में भर्ती होने का जज्बा पैदा हो गया था। परिजनों को कैप्टन आदित्य मिश्र की शहादत पर फख्र है। पर, कहीं एक इंच भी जमीन पाकिस्तानियों के हाथ चली जाती तो उसका मलाल जिंदगी भर रहता। 24 दिसंबर, 1974 को जन्में आदित्य को बचपन से ही खेलकूद से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में खासी रुचि रही।

‘मातृभूमि के लिए खुद को कर दिया कुर्बान’

 

लांसनायक केवलानंद द्विवेदी

रेजीमेंट : कुमाऊं

शहादत : 6 जून, 1999 कारगिल सेक्टर

 

‘30 मई, 1999 की सुबह उन्होंने आखिरी बार अपनी पत्नी से फोन पर बात की थी। वह डर गई थीं। पर, दूसरी ओर से आवाज सुनते ही उनका हौसला बंधा। लांसनायक ने कहा कि मैं अपनी मातृभूमि की रक्षा से पीछे नहीं हटूंगा। सर्वस्व लुटाकर देश की आन, बान व शान की रक्षा करूंगा। यही मेरा धर्म है। तुम दोनों बेटों और अपना ख्याल रखना।’

 

शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी ऐसे नायक हैं, जो अपनी बीमार पत्नी को छोड़कर युद्ध भूमि में पहुंच गए। बीमार पत्नी उनका हौसला बढ़ाती रहीं। कहती थीं कि मातृभूमि को आपकी अधिक जरूरत है। वह मां है। मां की सुरक्षा पहले। देशसेवा पहले। पर, उन्हें क्या पता था कि युद्ध भूमि से उनकी शहादत की खबर आएगी। वह खुद नहीं आएंगे।

 

शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी का जन्म 12 जून 1968 को पिथौरागढ़ में हुआ। दो भाइयों में वे बड़े थे। उनके पिता ब्रह्मदत्त द्विवेदी सेना में सूबेदार थे। उनकी ख्वाहिश थी कि दोनों बेटे फौज में भर्ती हों। पर, केवल केवलानंद ही उनके सपने को पूरा कर सके। लांसनायक के परिवार में बड़ा बेटा हेमचन्द है, जिसने प्रबंधन की पढ़ाई की है और छोटा बेटा तीरथ कंप्यूटर की शिक्षा ली। शहीद की ख्वाहिश रही थी कि फौज के जरिए देश की सेवा का जज्बा उनके परिवार में बना रहे और परिवार के अन्य लोग भी देश का नाम रोशन करें।

 

लांसनायक कारगिल सेक्टर में दुश्मनों के फाख्ते उड़ाते हुए आगे बढ़ रहे थे कि ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों की एक गोली उनके सीने में धंस गई। पर, उनके कदम नहीं रुके। अंतिम सांस तक उन्होंने दुश्मनों का सामना किया और शहीद हो गए। 6 जून, 1999 को उनकी शहादकी खबर परिवार को मिली। उनकी शहादत से परिवार टूट गया। इनकी शहादत की खबर सुनकर पूरा परिवार सदमे में था। मां अचानक से बीमार पड़ गईं। बीमारी में भी वो इनका नाम जपा करती थीं। उन्हें अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया गया, पर कुछ ही दिनों में वह भी चल बसीं।

 

बता दें कि शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी की शादी 1990 में हुई थी। उस वक्त वह 22 साल के थे और उनकी पत्नी कमला द्विवेदी 20 साल की थीं। चूंकि, सरहद की सुरक्षा में वह बेहद व्यस्त रहते थे। छुट्टियां भी बहुत कम मिलती थीं। इसलिए शादी के बाद केवल चार बार ही घर आए थे। युद्ध के बाद वह घर आते, पर उनकी शहादत की खबर पहले आ गई और पूरा परिवार बिखर सा गया। इस सदमे के चलते उनकी मां भी चल बसीं।

 

मुफलिसी में जीने की मजबूरी

एल्डिको रायबरेली रोड निवासी शहीद की पत्नी कमला नाराजगी जताते हुए कहती हैं कि लांसनायक केवलानंद द्विवेदी ने देश को सबकुछ मानकर जान न्यौछावर कर दी। जिस पर उन्हें फख्र भी है। पर, सरकारों ने बड़ी नाइंसाफी की। सरकारी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हुईं। इतना ही नहीं शहादत के बाद सरकार ने नौकरी से लेकर जो भी वादे किए थे, वे सब अधूरे हैं। जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलाकर बेटों तीरथराज व हेमचंद को पढ़ाया। सरकार ने भले ही हमारी उपेक्षा की हो, पर मेरा ख्वाब अपने बच्चों को सेना में ही भेजने का है।

‘भीषण गोलीबारी में लेते रहे घुसपैठियों से मोर्चा’

 

– राइफलमैन सुनील जंग

– रेजीमेंट : 11 गोरखा राइफल्स

– शहादत : 15 मई, 1999

 

‘आज राइफल उठाने का मौका मिला है। मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना पूरा होने जा रहा है। देश के लिए हंसते-हंसते कुर्बान होने का वक्त आ गया। यही हमारा कर्तव्य है।’

 

…1995 में महज 16 साल की उम्र में गोरखा राइफल्स में भर्ती होने वाले राइफलमैन सुनील जंग लखनऊ के पहले शहीद थे, जिन्होंने कारगिल में दुश्मनों की ईंट से ईंट बजाई थी। कारगिल युद्ध छिड़ने पर 10 मई, 1999 को सेना की ओर से उन्हें कारगिल सेक्टर पहुंचने के आदेश मिले। वह एक टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे। उन्हें केवल यह पता था कि चार से पांच सौ घुसपैठिए हिंदुस्तान की सीमा में घुस आए हैं। तीन दिनों तक भीषण गोलाबारी के बीच 15 मई को दुश्मन की एक नापाक गोली उनके सिर को चीरती हुई निकल गई।

 

राइफलमैन सुनील जंग की इस वीरता का बीजारोपण बचपन में ही हो गया था। देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली थी। छावनी स्थित तोपखाना में रहने वाली सुनील जंग की मां बीना अपने बेटे की शहादत पर फख्र जताते हुए कहती हैं कि उनका जीवन धन्य हो गया। उनके दादा मेजर नकुल जंग व पिता नर नारायण जंग महत भी सेना को सेवाएं दे चुके थे। उसी परंपरा को सुनील जंग ने आगे बढ़ाया। उनकी इस देशभक्ति का परिचय उस समय मिल गया था, जब वह आठ साल के थे और स्कूल के एक फैंसी ड्रेस प्रोग्राम में हिस्सा ले रहे थे।

 

उन्होंने मंच से ऐलान किया कि देश की रक्षा के लिए वह अपने लहू का एक-एक कतरा बहा देंगे और मौका पड़ने पर उन्होंने अपने शब्दों का अक्षरश: पालन भी किया। वर्दी का इतना शौक था कि जिद करने पर मैंने उनके पिता की पुरानी वर्दी काटकर उनके लिए ड्रेस तैयार की थी।

 

मां को मलाल, नहीं मिला शौर्य चक्र

राइफलमैन सुनील जंग की मां बीना महत इस बात से व्यथित हैं कि बेटे को मरणोपरांत शौर्य चक्र नहीं मिला, जिसके लिए वह लगातार केंद्र सरकार से गुहार भी लगाती रही हैं। मां चाहती है कि सुनील की बहन सुनीता को सरकारी नौकरी मिल जाए तो तंगहाली दूर हो जाए। बीना महत ने बताया कि सरकार ने स्टेडियम बनाने का वादा किया था, जो अभी तक अधूरा है।

 

जब फूट-फूट कर रोया दूधवाला

शहीद सुनील जंग को गरीबों के साथ बेहद हमदर्दी थी। छोटे बच्चों और गरीबों से उनका अपनापन परिवार जैसा ही था। मां ने बताया कि वह बेहद मिलनसार थे। जब स्कूल लंच बॉक्स ले जाते थे तो अकसर ही खुद के बजाए छोटे बच्चों को खिला दिया करते थे। दूधवाले से लगाव तो ऐसा था, जिसे शब्दों में बयां नहीं कर सकते। यही वजह है कि जब वह शहीद हुए तो दूधवाला फूट-फूटकर रोया।

‘मैं सेना में मोजे व ट्राउजर गिनने के लिए नहीं हूं’

 

शहीद : मेजर विवेक गुप्ता

रेजीमेंट : 2 राजपूताना राइफल्स

 

‘मेरे जिस्म का एक-एक कतरा लहू देश की अमानत है। वक्त आ गया है कर्ज चुकाने का। पीछे हटने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। जय हिंद।’

 

कारगिल हीरोज में मेजर विवेक गुप्ता का नाम गर्व से लिया जाता है। उनका जीवन बहादुरी के किस्सों से भरा हुआ है। कारगिल युद्ध में उन्होंने अदम्य शौर्य व पराक्रम का परिचय देकर अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कराया है। उन्हें महावीर चक्र प्रदान किया गया है।

 

दरअसल, सेकंड राजपूताना राइफल्स के मेजर विवेक गुप्ता और उनके छह साथी तुलोलिंग में पहुंचे, जहां उन्होंने असाधारण शौर्य का परिचय दिया। उनके परिचित उनके परिचित बताते हैं कि अंतिम बार वह मई में घर आए थे जबकि उनकी यूनिट वादियों में ही तैनात थी। पर, जैसे ही उन्हें युद्ध की सूचना मिली, वह तत्काल वापस लौट गए और यूनिट को लेकर कूच कर गए।

 

दो मुश्किल चोटियों को जीतने के बाद वह जून को काल के गाल में समां गए। आठ जून को मेजर गुप्ता ने अपने पिता को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘आपको मुझ पर फख्र होगा।’ पर, विडम्बना देखिए कि यह पत्र उनके पिता को 17 जून को मिला, जब आर्मी शहीद को सलामी दे रही थी। मेजर गुप्ता ने नेशनल डिफेंस एकेडमी से ग्रेजुएशन किया, जहां से निकलने के बाद उन्होंने एक बार अपने पिता से कहा कि वह सेना में मोजे व ट्राउजर गिनने के लिए नहीं हैं। यह बात उन्होंने तब कही, जब उन्हें सुरक्षित पोस्टिंग दिलाने की चर्चा हो रही थी। उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

application/x-httpd-php footer.php ( PHP script text )
%d bloggers like this: